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Friday, June 28, 2013

दिल्ली उच्च न्यायलय में हिंदी भाषा के प्रयोग की स्वीकृति हेतु

दिल्ली उच्च न्यायलय में हिंदी भाषा के प्रयोग की स्वीकृति हेतु  (Use of Hindi in High Courts)


A copy of the letter written to Prime Minister of India by
अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत  aur प्रकाश इंडिया

(aaj bhi FIR Farsi Bhasha mein likhi Jaati hai aur jo shabad istemaal kiye jaatey hain uska matlab Police waalon ko bhi nahin Pata. Phir UPA sarkar kahti hai Bharat Nirman. )  Are we eligible to call ourselves 'Independent Country"?

(आज भी पुलिस सूचना  रिपोर्ट फारसी भाषा में लिखी जाती है. जिन शब्दों का पुलिस इस्तेमाल करती है उसका मतलब न तो कोर्ट को और न ही पुलिस वालों की  समझ में आता है. कोर्ट कहती है रिपोर्ट को इंग्लिश में टाइप करके लआओ ) क्या हम आज़ाद देश के नागरिक हैं ?
 
श्री मनमोहन सिंह जी 11.06.2013
माननीय प्रधानमंत्री
साउथ ब्लाक , नई दिल्ली -110011

विषय : दिल्ली उच्च न्यायलय में हिंदी भाषा के प्रयोग की स्वीकृति हेतु 

महोदय,

सुप्रीम कोर्ट ने हाल के अपने एक फैसले में निर्देश दिया है कि यदि कोई चाहता है कि उससे संबंधित फैसले की प्रति उसे उसी की भाषा में मुहैया कराई जाए, तो इसे सुनिश्चित किया जाए। विश्व के इस सबसे बड़े प्रजातंत्र में आजादी के 65 साल बाद भी सुप्रीम कोर्ट की किसी भी कार्यवाही में हिंदी का प्रयोग पूर्णत: प्रतिबंधित है। अचरज है कि यह प्रतिबंध भारतीय संविधान की व्यवस्था के तहत है। यह हमारी आजादी को निष्प्रभावी बना रहा है। संविधान के अनुच्छेद 348 के खंड 1 के उपखंड (क) में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट और हर हाई कोर्ट में सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी भाषा में होंगी। हालांकि इसी अनुच्छेद के खंड 2 के तहत किसी राज्य का राज्यपाल यदि चाहे तो राष्ट्रपति की पूर्व सहमति सेहाई कोर्ट में हिंदी या उस राज्य की राजभाषा के प्रयोग की अनुमति दे सकता है।

संविधान लागू होने के 65 वर्ष बाद भी केवल चार राज्यों राजस्थान, यूपी, मध्य प्रदेश और बिहार के हाई कोर्ट में किसी भारतीय भाषा के प्रयोग की अनुमति है। सुप्रीम कोर्ट में अंग्रेजी के प्रयोग की अनिवार्यता हटाने और एक या एक से अधिक भारतीय भाषा के प्रयोग की अनुमति देने का अधिकार राष्ट्रपति या किसी अन्य अधिकारी के पास नहीं है। इसके लिए संविधान संशोधन ही उचित रास्ता है। संविधान के अनुच्छेद 348 के खंड 1 में संशोधन द्वारा यह प्रावधान किया जाना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट और प्रत्येक हाई कोर्ट में सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी अथवा कम से कम एक भारतीय भाषा में होंगी।

भारतीय संसद में सांसदों को अंग्रेजी के अलावा संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित सभी 22 भारतीय भाषाओं में बोलने की अनुमति है। श्रोताओं को यह विकल्प है कि वे मूल भारतीय भाषा में व्याख्यान सुनें अथवा उसका हिंदी या अंग्रेजी अनुवाद सुनें, जो उन्हें उसी समय उपलब्ध कराया जाता है। अनुवाद की इस व्यवस्था के तहत उत्तम अवस्था तो यह होगी कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में एक या एक से ज्यादा भारतीय भाषाओं के प्रयोग का अधिकार जनता को उपलब्ध हो। किसी भी नागरिक का यह अधिकार है कि अपने मुकदमे के बारे वह न्यायालय में बोल सके। परंतु अनुच्छेद 348 की इस व्यवस्था के तहत सिर्फ चार को छोड़कर शेष सभी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में यह अधिकार अंग्रेजी न बोल सकने वाली देश की 97 प्रतिशत जनता से छीन लिया गया है। इनमें से कोई भी इन न्यायालयों में मुकदमा करना चाहे, या उस पर किसी अन्य द्वारा मुकदमा दायर कर दिया जाए तो मजबूरन उसे अंग्रेजी जानने वाला वकील रखना ही पड़ेगा, जबकि अपना मुकदमा बिना वकील के ही लड़ने का हर नागरिक को अधिकार है। वकील रखने के बाद भी वादी या प्रतिवादी यह नहीं समझ पाता है कि उसका वकील मुकदमा सही ढंग से लड़ रहा है या नहीं।

निचली अदालतों और जिला अदालतों में भारतीय भाषा के प्रयोग की अनुमति है। हाई कोर्ट में जब कोई मुकदमा जिला अदालत के बाद अपील के रूप में आता है तो मुकदमे से संबंधित निर्णय व अन्य दस्तावेजों के अंग्रेजी अनुवाद में समय और धन का अपव्यय होता है। वैसे ही बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान हाई कोर्ट के बाद जब कोई मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में आता है तो भी अनुवाद में समय और धन की बर्बादी होती है। प्रत्येक हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में एक-एक भारतीय भाषा के प्रयोग की भी अगर अनुमति हो जाए तो हाई कोर्ट तक अनुवाद की समस्या पूरे देश में लगभग समाप्त हो जाएगी। अहिंदी भाषी राज्यों के भारतीय भाषाओं के माध्यम से संबद्ध मुकदमों में से जो मुकदमे सुप्रीम कोर्ट में आएंगे, केवल उन्हीं में अनुवाद की आवश्यकता होगी।

अनुच्छेद 343 में कहा गया है कि संघ की राजभाषा हिंदी होगी। जबकि अनुच्छेद 351 के मुताबिक संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए और उसका विकास करे। प्रगति और भाषा क्या स्वाधीनता का अर्थ केवल 'यूनियन जैक' के स्थान पर 'तिरंगा झंडा' फहरा लेना है? कहने के लिए भारत विश्व का सबसे बड़ा प्रजातंत्र है, परंतु जहां जनता को अपनी भाषा में न्याय पाने का हक नहीं है, वहां प्रजातंत्र कैसा? दुनिया के तमाम उन्नत देश इस बात के प्रमाण हैं कि कोई भी राष्ट्र विदेशी भाषा में काम करके उन्नति नहीं कर सकता। प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से विश्व के वही देश अग्रणी हैं, जो अपनी जनभाषा में काम करते हैं और वे देश सबसे पीछे हैं, जो विदेशी भाषा में काम करते हैं। विदेशी भाषा में उन्हीं अविकसित देशों में काम होता है, जहां का बेईमान अभिजात वर्ग विदेशी भाषा को शोषण का हथियार बनाता है और सामाजिक-आर्थिक विकास के अवसरों में अपना पूर्ण आरक्षण बनाए रखना चाहता है।

आप से सविनय निवेदन है कि दिल्ली उच्च न्यायलय में हिंदी में भी कार्यवाही की व्यवस्था की जाए और जनता को अपनी भाषा में न्याय पाने का हक सुनिश्चित किया जाए।

Thursday, June 6, 2013

Is it the Police is waiting for another gang rape incident as that of December 16 Nirbhaya Gang Rape in a moving bus?

Is it the Police is waiting for another gang rape incident as that of December 16 Nirbhaya Gang Rape in a moving bus?
Is it due to Failure of Law Implementing Agencies!

Subsequent to December 16 Nirbhaya Gang Rape incident, all law implementing agencies got activated. Traffic Police also came out heavely on motorist in implementation of  SC ban of use of solar film/ tinted glasses on glasses of vehicles. The films were getting removed from the glasses and vehicles using black films and tinted glasses were being challaned. However as usual such drive lasted for few days.



It is not only the drive by the traffic police which lasted only for few days as the vehicles are still on the roads with tinted glasses and dark films, the most surprising part is that the motorist have invented new innovations. after all Indian brains keep on searching new and new ways to violate the rules without being prosecuted. The vehicle owners have started removing the glasses itself and are covering it permanently with sheets so as to avoid prosecution. At the same time the city roads have again becoming unsafe. The example can be seen in the above two pictures. Many such vehicles could be seen on roads without being stopped by the implementing agencies. Most of such vehicles are 'commercial vehicles'. The Bus in which December 16 gang rape happened was also commercial.

It further surprises as to why city police in Delhi is not taking any action against such motorists. I have posted such snaps even on the facebook of Delhi Traffic Police. It seems that Delhi Traffic Police is waiting for some more heinous crimes to take place before they get awake and take action against such offenders. I am also confident that Delhi Police would also agree that use of films and tinted glasses was much better and safer than closing it permanently.  !Jago Police Jago!